स्वतंत्रता सेनानी आचार्य रामदेव का जीवन परिचय | Acharya Ramdev ka jeevan parichay | आचार्य रामदेव की जीवनी हिन्दी में |


स्वतंत्रता सेनानी आचार्य रामदेव का जीवन परिचय | Acharya Ramdev ka jeevan parichay | आचार्य रामदेव की जीवनी हिन्दी में | 

नाम: आचार्य रामदेव

जन्म: 31 जुलाई 1881 ई. 

स्थान: बजवाड़ा, होशियारपुर, पंजाब, 

मृत्यु: 9 दिसंबर 1939 ई. देहरादून 

पिता: लाला चन्दूलाल 

शिक्षा: बी.ए., बी.टी.

विद्यालय: सेण्ट्रल कॉलेज लाहौर, डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर

व्यवसाय: आर्यसमाज के नेता, शिक्षाशास्त्री, इतिहासकार, स्वतन्त्रता सेनानी, महान वक्ता थे।

स्थापना: कन्या गुरुकुल महाविद्यालय (देहरादून)

कृतियाँ: वैदिक धर्म और युवा भारत, पुराण मत पर्यालोचन, आर्य और दस्यु, दिग्विजयी दयानन्द, भारतवर्ष का इतिहास, प्रथम खण्ड, भारतवर्ष का इतिहास, द्वितीय खण्ड, भारतवर्ष का इतिहास, तृतीय खण्ड 

👉आचार्य स्वामी जी ने 1933 में देहरादून में कन्या गुरुकुल की स्थापना की।

👉1932 में देश के स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े।

👉आचार्य रामदेव की प्रसिद्ध ग्रन्थ "भारतवर्ष का इतिहास" (इसके तीन खंड हैं प्रथम द्वितीय और तृतीय खंड) है।

स्वतंत्रता सेनानी आचार्य रामदेव का जीवन परिचय। 

आचार्य रामदेव का जन्म 31 जुलाई 1881 को पंजाब प्रान्त में होशियारपुर जिले के बजवाड़ा ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला चन्दूलाल था। वे अध्यापक थे। अत: उन्होंने अपने पुत्र की शिक्षा की व्यवस्था सुचारु रूप से की। 15 वर्ष की आयु में रामदेव जी ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर में अध्ययनार्थ प्रविष्ट हुए। उन दिनों गुरुकुल दल और कॉलेज दल में मतभेद पराकाष्ठा पर थे। रामदेव की सहानभूति गुरुकुल दल की और होने के कारण उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। ऐसे कठिन समय में उन्हें महात्मा मुंशीराम जी ने सहारा दिया। मुंशीराम ने उन्हें आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब की साप्ताहिक पत्रिका "आर्यपत्रिका" का उपसम्पादक बना दिया। उन्होंने 1904 में बी.ए. और 1905 में सेण्ट्रल कॉलेज लाहौर से बी.टी. की परीक्षा उतीर्ण की। आचार्य रामदेव आर्यसमाज के नेता, शिक्षाशास्त्री, इतिहासकार, स्वतन्त्रता-संग्राम सेनानी एवं महान वक्ता थे। उन्होने भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में मौलिक अनुसन्धान कर हिन्दी में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ भारतवर्ष का इतिहास प्रकाशित किया। आचार्य रामदेव जी ने 1923 में देहरादून में कन्या गुरुकुल की स्थापना की जो 'कन्या गुरुकुल महाविद्यालय' नाम से जाना जाता है तथा गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय का भाग है।

महात्मा मुंशीराम ने आचार्य रामदेव को गुरुकुल कांगडी में मुख्य अध्यापक के पद पर नियुक्त किया। शिक्षाशास्त्र के मर्मज्ञ आचार्य रामदेव ने गुरुकुल की व्यवस्था, पाठ्यपद्धति, तथा शिक्षा प्रणाली में अनेक सुधार किये। संस्कृत और वेद तथा आर्ष ग्रन्थों के साथ साथ अर्थशास्त्र, इतिहास,  राजनीति, गणित, अंग्रेजी तथा विज्ञान भी पाठ्यक्रम में मिलाये गये। इन परिवर्तनों की वजह से गुरुकुल कांगडी ने एक विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल किया। रामदेव 1932 में देश के स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। पंजाब में कांग्रेस आन्दोलन के सर्वाधिकारी रहे और कारावास भी भोगा। 1936 में होनेवाले "कांफ्रेंस ऑफ लिविंग रिलीजन्स" में सम्मिलित होने का निमन्त्रण प्राप्त कर आप उसमे जाने के लिये तैयार हुए परन्तु पक्षाघात का आक्रमण होने के कारण यह यात्रा रुक गयी। 9 दिसम्बर 1939 को लगभग तीन वर्ष की अस्वस्थता के पश्चात् देहरादून में उनका निधन हुआ।

आचार्य रामदेव की कृतियाँ: भारतवर्ष का इतिहास, (इसके तीन खंड हैं), पुराण मत पर्यालोचन, आर्य और दस्यु, दिग्विजयी दयानन्द, वैदिक धर्म और युवा भारत,आदि है। 


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