वृन्द का जीवन परिचय। Vrind ka jeevan parichay | वृन्द की लघु जीवनी हिंदी में |

 


वृन्द का जीवन परिचय | Vrind ka jeevan parichay | वृन्द की लघु जीवनी हिंदी में | 

पूरानाम: वृन्दावनदास

उपनाम: वृन्द

जन्म: सन् 1643 ई.

मृत्यु: सन् 1723 ई.

स्थान: मेड़ता, जोधपुर, राजस्थान

पिता: रुप जी

माता: कौशल्या

पत्नी: नवरंगदे

काल: रीतिकालीन कवि

पेशा: हिंदी साहित्य के कवि

प्रसिद्ध रचनाएँ: नीतित्साई 1704, वृन्द सतसई, श्रृंगार शिक्षा 1691,भव पंचासिका, रूपक चयनिका, अलंकार सतसई, हितोपदेश नाटक, आदि।

रचनाएँ: शिखर छंद, भाव पंचाशिका, शृंगार शिक्षा, पवन पचीसी, हितोपदेश सन्धि, वृन्द सतसई, वचनिका, सत्य स्वरूप, यमक सतसई, हितोपदेशाष्टक, भारत कथा,

👉वृन्द ने मुगल सम्राट औरंगजेब के यहाँ ये दरबारी कवि रहे।


कवि वृन्द का जीवन परिचय। 

वृन्द हिन्दी के कवि थे। रीतिकालीन परम्परा के अन्तर्गत वृन्द का नाम आदर के साथ लिया जाता है। इनके नीति के दोहे  बहुत प्रसिद्ध हैं। वह हिंदी साहित्य के रीतिकाल के एक महत्वपूर्ण कवि थे।

प्राचीन कवियों की भाँति वृन्द का जीवन परिचय भी प्रमाणिक नहीं है। पं॰ रामनरेश त्रिपाठी इनका जन्म सन् 1643 में मथुरा उत्तर प्रदेश क्षेत्र के किसी गाँव का बताते हैं। इनका पूरा नाम वृन्दावनदास था। वृन्द जी की माता का नाम कौशल्या और पिता का नाम रुप जी था। इनकी पत्नी का नाम नवंरगदे था। वृन्द जाति के सेवक अथवा भोजक थे। वृन्द के पूर्वज बीकानेर के रहने वाले थे। परन्तु इनके पिता रूप जी जोधपुर के राज्यान्तर्गत मेड़ते में जा बसे थे। वहीं सन् 1643 में वृन्द का जन्म हुआ था। दस वर्ष की अवस्था में ये काशी आये और तारा जी नामक एक पंडित के पास रहकर वृन्द ने साहित्य, दर्शन आदि विविध विधयों का ज्ञान प्राप्त किया। काशी में इन्होंने  व्याकरण, साहित्य, वेदान्त, गणित आदि का ज्ञान प्राप्त किया। और काव्य रचना सीखी।

मुगल सम्राट औरंगजेब के यहाँ ये दरबारी कवि रहे। मेड़ते वापस आने पर जसवन्त सिंह के प्रयास से औरंगजेब के कृपापात्र नवाब मोहम्मद खाँ के माध्यम से वृन्द का प्रवेश शाही दरवार में हो गया़। दरबार में "पयोनिधि पर्यौ चाहे मिसिरी की पुतरी" नामक समस्या की पूर्ति करके इन्होंने औरंगजेब को प्रसन्न कर दिया। उसने वृन्द को अपने पौत्र अजी मुशशान का अध्यापक नियुक्त कर दिया। जब अजी मुशशान बंगाल का शाशक हुआ तो वृन्द उसके साथ चले गए। सन् 1707 में  किशनगढ़ के राजा राजसिंह ने अजी मुशशान से वृन्द को माँग लिया। सन् 1723 में किशनगढ़ में ही वृन्द का देहावसान हो गया।

वृन्द की ग्यारह रचनाएँ प्राप्त हैं: समेत शिखर छंद, भाव पंचाशिका, शृंगार शिक्षा, पवन पचीसी, हितोपदेश सन्धि, वृन्द सतसई, वचनिका, सत्य स्वरूप, यमक सतसई, हितोपदेशाष्टक, भारत कथा, वृन्द ग्रन्थावली नाम से वृन्द की समस्त रचनाओं का एक संग्रह डॉ॰ जनार्दन राव चेले द्वारा संपादित होकर 1971 ई० में प्रकाश में आया है। इनके लिखे दोहे 'वृन्द विनोद सतसई' में संकलित हैं। वृन्द के 'बारहमासा' में बारहों महीनों का सुन्दर वर्णन है। 'शृंगार शिक्षा' में नायिका भेद के आधार पर आभूषण और शृंगार के साथ नायिकाओं का चित्रण है। 'पवन पचीसी' में ऋतु वर्णन है। इस रचना में दोहा, सवैया और घनाक्षरी छन्दों  का प्रयोग हुआ है। हिन्दी में वृन्द के समान सुन्दर दोहे बहुत कम कवियों ने लिखे हैं। उनके दोहों का प्रचार शहरों से लेकर गाँवों तक में है। वृन्द की रचनाएँ रीति परम्परा की हैं। उनकी 'नयन पचीसी' युगीन परम्परा से जुड़ी कृति हैं। इसमे दोहा, सवैया और घनाक्षरी छंदों का प्रयोग हुआ है। इन छंदो का प्रभाव पाठकों पर पड़ता है। 'यमक सतसई' मे विविध प्रं कार से यमक अलंकार का स्वरूप स्पष्ट किया गया हैं। इसके अन्तर्गत 715 छंद है।


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