फ़ज़ले हक़ खैराबादी का जीवन परिचय | Fazle Haq Khairabadi ka jivan prichay |


 फ़ज़ले हक़ खैराबादी का जीवन परिचय | Fazle Haq Khairabadi ka jivan prichay |


नाम: अल्लामा फ़ज़ले हक़ खैराबादी

जन्म: 1796 , खैराबाद, भारत

मृत्यु: 19 अगस्त, 1861 

स्थान: अंडमान द्वीप समूह

शिक्षा: मदरसा-ए रहीमिया

पेशा: मुफ्ती, विद्वान, धर्मशास्त्री और कवि


फ़ज़ले हक़ खैराबादी का जीवन परिचय |

अल्लामा फज़ले हक खैराबादी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के क्रान्तिकारी, तर्कशास्त्री व उर्दू अरबी, फारसी के प्रसिद्ध शायर और कवि थे। उनका जन्म 1797 में उत्तर प्रदेश राज्य के ज़िला सीतापुर के शहर खैराबाद में मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता फ़ज़ल-ए-इमाम खैराबादी , सदर अल-सदुर थे, जो मुगलों के धार्मिक मामलों के मुख्य सलाहकार थे। फ़ज़ले हक़ खैराबादी ने धार्मिक रीति रिवाजों से शिक्षा प्राप्त की। 

फ़ज़ल-ए-हक़ 13 वर्ष की आयु में शिक्षक बन गए थे। और फिर 1816 में उन्नीस वर्ष की आयु में ब्रिटिश सरकार में नौकरी कर ली। 1828 में, उन्हें क़ज़ा विभाग में मुफ़्ती के पद पर नियुक्त किया गया। इस्लामी अध्ययन और धर्मशास्त्र के विद्वान होने के अलावा, वे एक साहित्यिक व्यक्तित्व भी थे। लेकिन एक ऐसा समय आया जब उन्होंने नौकरी नहीं करने का मन बना लिया और 1831 में सरकारी नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के पश्चात वह दिल्ली के मुग़ल दरबार में कामकाज देखने लगे और शायरो की महफिलें से वाबस्ता होने लगे। 

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतीयों ने ब्रिटिश कब्जे के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। फ़ज़ले हक़ खैराबादी ने मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के साथ कई निजी बैठकें कीं। और 1857 के दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के ज़ुल्मो की हद हो गई तो हिन्दुस्तान के राजा-महाराजाओं व महारानियो तथा नवबो व मौलवियों द्वारा अंग्रेजों को देश से बाहर निकलने का प्रयास किया और ज़बरदस्त विद्रोह की योजना बनाई। जिसका नेतृत्व क्रांति के महानायक मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफर द्वारा किया गया और अल्लामा फज़ले हक खैराबादी ने अहम भूमिका निभाई ।अल्लामा फज़ले हक खैराबादी द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा देकर मुस्लिम समुदाय को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल होने की अपील की। जिसका लाभ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर व अन्य विद्रोही नेताओं को मिला। मौलाना द्वारा फतवा जारी करने के बाद से ही अंग्रेज़ो द्वारा उनकी तलाश शुरू हो गई। 1857 की क्रांति असफल हो जाने के बाद मौलाना बचते बचाते दिल्ली से खैराबाद तशरीफ ले आये। खैराबाद में अंग्रेजों को भनक लग गई और 30 जनवरी 1859 को उन्हें खैराबाद से गिरफ्तार कर लिया गया। खैराबादी से उन्हें लखनऊ सेंशन कोर्ट ले जाया गया और वहीं पर मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे की पैरवी उन्होंने खुद की। कोई वकील नियुक्त नहीं किया। मौलाना पर अग्रेंजों के खिलाफ जेहाद का फतवा जारी करने तथा लोगों को विद्रोह के लिए उकसाने के संगीन आरोप लगाये गये। मुकदमे की वार्ता के समय उन्होंने अपने अपराध को स्वीकार किया पर झूठ नहीं बोला और कहा- हॉ वह फतवा सही है, वह मेरा लिखा हुआ था और आज भी मैं अपने फतवे पर कायम हूं। आरोपो को स्वीकार करने के पश्चात उन्हें काला पानी की सज़ा सुनाई गई और सारी जायदाद ज़ब्त करने का आदेश जारी किया गया। अंडमान निकोबार (सेलुलर जेल) में ही 19 अगस्त 1861में उनका इंतकाल हो गया। उन्होंने इस्माइल देहलवी की तक्वियत अल-ईमान के खंडन में तहक़ीक़ अल-फ़तवा फ़ी अब्तल अल-तग़वा लिखा और अल-थौरा अल-हिंदिया जैसी पुस्तकों की रचना की ।वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता थे और उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध अभियान चलाया। उन्होंने 1857 में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध सैन्य जिहाद के पक्ष में एक प्रारंभिक धार्मिक फरमान जारी किया और कई अन्य लोगों को 1857 के विद्रोह में भाग लेने के लिए प्रेरित किया 

टिप्पणियाँ

Read more

श्याम नारायण पाण्डेय का जीवन परिचय | Shyam Narayan Pandey ka jeevan parichay | श्याम नारायण पाण्डेय की लघु जीवनी हिंदी में |

सोहन लाल द्विवेदी का जीवन परिचय | Sohan Lal Dwivedi ka jeevan parichay | सोहन लाल द्विवेदी की लघु जीवनी हिंदी में |

राष्ट्रकवि प्रदीप का जीवन परिचय | kavi pradeep ka jeevan parichay | कवि प्रदीप की लघु जीवनी हिंदी में |

सुधांशु त्रिवेदी का जीवन परिचय | sudhanshu trivedi ka jeevan parichay | सुधांशु त्रिवेदी की जीवनी हिन्दी में