बाञ्छानिधि महान्ति का जीवन परिचय | Biography of Banchhanidhi Mohanty |
बाञ्छानिधि महान्ति का जीवन परिचय | Biography of Banchhanidhi Mohanty |
नाम: बाञ्छानिधि महान्ति
जन्म: 20 अप्रैल 1897
मृत्यु: 19 अप्रैल 1938
स्थान: भद्रक जिला, ओड़िशा, ब्रिटिश भारत
पेशा: कवि, गायक, स्वतंत्रता सेनानी
प्रसिद्धि: देशभक्तिपूर्ण कविता एवं गीत
बाञ्छानिधि महान्ति का जीवन परिचय |
बाञ्छानिधि महान्ति का जीवन परिचय एक ऐसे ओजस्वी स्वतंत्रता सेनानी और 'जातीय कवि' (राष्ट्रीय कवि) का है, जिनकी आवाज़ ने ब्रिटिश शासन के दौरान ओडिशा के जन-जन में देशभक्ति की अलख जगाई थी।
बाञ्छानिधि महान्ति का जन्म 20 अप्रैल 1897 को ओडिशा के भद्रक जिले के बासुदेबपुर के पास स्थित एराम (Eram) नामक ऐतिहासिक गाँव में हुआ था। यह वही एराम भूमि है जिसे आगे चलकर ओडिशा का 'जलियांवाला बाग' कहा गया। उनका बचपन और शुरुआती जीवन एक ऐसे परिवेश में बीता जहाँ देश की सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं। कम उम्र से ही उनके भीतर समाज सेवा और साहित्य के प्रति गहरा प्रेम था। उन्होंने 1911 में मैट्रिक की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। उनके विद्यार्थी जीवन में ही राष्ट्रीय आंदोलन और सामाजिक प्रश्नों के प्रति रुचि विकसित हो गई थी।
जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश भर में राष्ट्रीय आंदोलन की लहर दौड़ी, तो बाञ्छानिधि महान्ति खुद को रोक नहीं पाए। वह पूरी तरह से गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और अन्य प्रमुख जन-आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। अपनी ओजस्वी गतिविधियों और अंग्रेजों के खिलाफ मुखर विरोध के कारण उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा कई बार जेल भेजा गया, लेकिन अंग्रेजों के तमाम जुल्म और यंत्रणाएं उनके हौसले को नहीं डिगा सकीं।बाञ्छानिधि महान्ति केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वह एक बेहद ताकतवर और भावुक राष्ट्रवादी कवि भी थे। उन्हें ओडिशा में प्रेम और सम्मान के साथ 'जातीय कवि' (National Poet) की उपाधि से नवाजा गया। उनकी कविताओं और गीतों में मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम, स्वतंत्रता की तड़प, अन्याय के खिलाफ बगावत और सामाजिक सुधार की गूंज साफ सुनाई देती थी। उनकी रचनाएं उस दौर के युवाओं और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का मुख्य स्रोत बन गईं, जिन्हें गाकर लोग अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शनों में उतरते थे। उनके सम्मान में उनके गृह क्षेत्र के एक हिस्से का नाम ऐतिहासिक रूप से 'स्वाधीन बाञ्छानिधि चकले' के रूप में भी अमर किया गया।अल्प आयु में ही, मात्र 41 वर्ष की उम्र में, 19 अप्रैल 1938 को उनका महान जीवनवृत समाप्त हो गया और वह इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। हालांकि उनका जीवन छोटा रहा, लेकिन उनका कृतित्व और त्याग बहुत बड़ा था।आज भी ओडिशा के इतिहास में बाञ्छानिधि महान्ति को एक अमर क्रांतिकारी, और ओड़िशा में राष्ट्रीय कवि निष्ठावान राष्ट्रभक्त और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अत्यंत आदर के साथ याद किया जाता है।
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