बसंती देवी का जीवन परिचय |Biography of Basanti Devi
बसंती देवी का जीवन परिचय |Biography of Basanti Devi
जन्म: 23 मार्च, 1880
स्थान: असम, भारत
मृत्यु: 7 मई, 1974
स्थान: कोलकाता, भारत
पिता : बरदानाथ हलदर
पति: चित्रांग दास
संतान: अपर्णा देवी
शिक्षा: लोरेटो हाउस
संबद्ध:स्वतंत्रता कार्यकर्ता
पार्टी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
पुरस्कार: पद्मविभूषण 1973
बसंती देवी का जीवन परिचय |
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बसंती देवी एक ऐसी महान वीरांगना और समाज सुधारक थीं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उनका जन्म 23 मार्च 1880 को असम में हुआ था। उनके पिता ब्रदानाथ हलदार एक आध्यात्म थे। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कोलकाता के प्रसिद्ध लोरेटो हाउस से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1897 में लगभग 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह बंगाल के कट्टर बैरिस्टर, राष्ट्रवादी नेता और देशबंधु के नाम से स्मारक चित्तरंजन दास के साथ हुआ। विवाह के बाद उन्होंने देश सेवा का मार्ग अपनाया और हर कदम अपने पति के साथ दिया। गांधीजी के सिद्धांत पर शुरू हुए असहयोग आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। दिसंबर 1921 का समय इतिहास में स्वर्णिम अभिलेखों में अंकित है जब कलकत्ता की गलियों में विदेशी खाद्य पदार्थों का बहिष्कार और स्वदेशी खादी का प्रचार करने के दौरान अंग्रेज़ों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था। वह बंगाल की पहली ऐसी महिला थीं, जिनमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल जाना शामिल था। हालाँकि, देश भर में भारी जनाक्रोश और विरोध को देखते हुए बड़प्पन को उसी रात रिहा करना पड़ा।
वर्ष 1921 और 1922 में जब उनके पति चित्तरंजन दास और अन्य प्रमुख नेता जेल में बंद थे, तब बसंती देवी ने आगे बढ़ते हुए बंगाल में प्रांतीय कांग्रेस समिति की अध्यक्षता और आंदोलन को कमजोर कर दिया। इसके अलावा उन्होंने चितरंजन दास के साप्ताहिक पत्र बंगलौर कथा के संपादन और प्रकाशन की जिम्मेदारी भी शुरू की। वर्ष 1922 में उन्होंने चटगांव में प्रांतीय सम्मेलन का आयोजन किया और अपने ओजस्वी भाषण से जनता में नई क्रांति की अलख जगाई। ग्रेट इंडिपेंडेंस फ्रैंटीलेंट सुपरस्टार चंद्र बोस चित्तरंजन दास को अपने राजनीतिक गुरु मानते थे और बसंती देवी को वे दत्तक मां की तरह अपने मानते थे और जीवन भर उनका अगाध सम्मान करते थे। देश को आज़ादी मिलने के बाद भी बसंती देवी का सामाजिक सरोकार कम नहीं हुआ। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रशिक्षित करने के लिए अपनी प्रतिभाओं के साथ मिलकर नारी कर्म मंदिर की स्थापना की। महिलाओं की उच्च शिक्षा और उनकी प्रतिष्ठा के लिए उनके प्रयास के परिणामस्वरूप वर्ष 1959 में कोलकाता में प्रसिद्ध बसंती देवी कॉलेज की स्थापना हुई। राष्ट्र और समाज के प्रति उनके वर्ष में इस अतुलनीय एवं ऐतिहासिक योगदान का जिक्र करते हुए भारत सरकार ने 1973 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया। लगभग 94 वर्ष की आयु में 7 मई 1974 को इस महान स्वतंत्रता सेनानी का स्वर्गवास हो गया। उनका संपूर्ण जीवन देशप्रेम, त्याग, साहस और दान का एक ऐसा उदाहरण है जो आने वाली हर पीढ़ी को हमेशा जीवित रहने के लिए प्रेरित करता है।
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